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जातियों का राजनीति शास्त्र

भारत में जातियाँ एक वास्तविकता है। यह सामाजिकता का ताना बाना बनाते हुए समाज को बहुत अंदर तक प्रभावित करती हैं।

शब्द व्युत्पत्ति की दृष्टि से जाति शब्द संस्कृत की जनि (जन) धातु में क्तिन प्रत्यय लगाकर बना है। न्याय सूत्र के अनुसार जाति समान जन्म वाले लोगों को मिलाकर बनती है।

व्याकरण के अनुसार जाति की परिभाषा है जो आकृति के द्वारा पहचानी जाये सब लिंगो के साथ न बदल जाये और एक बार बोलने से जान ली जाये।

वेद में चार वर्ण की उत्तपत्ति ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र चातुर्वर्ण का सिद्धांत दिया है किंतु यह विभाजन एक ही पुरुष का है अर्थात मूल वही है स्वरूप के स्तर पर भेद है। वर्ण के स्तर पर सभी समान है यह स्तरीकरण समाज को गति देने के लिए है।

भारतीय शास्त्र आपस्तंभसूत्र, याज्ञवल्कय स्मृति, परशुराम स्मृति, महाभारत आदि में 64 प्रकार के व्यवसायों का उल्लेख है। उन व्यवसायों और क्षेत्र विशेष, कार्य विशेष के आधार पर वर्ण के अंतर्गत ही हर जाति का नाम दिया गया था लेकिन यह वर्ण से भिन्न नहीं था। प्रारम्भ में पेशा बदला जा सकता था किंतु समय के साथ परिवार उस पेशे के विशेषज्ञ हो गये। यथा कारीगर, शिल्पकार, रंगरेज, बुनकर, जूता बनाने वाला। कार्य की विशेषता को सुरक्षित करने के लिये उन्हें जो नाम दिया गया बाद में उसने जाति का नाम ले लिया जैसे चमड़े का काम करने वाले चर्मकार, लोहे का काम करने वाले लुहार, नक्काशी करने वाले शिल्पकार आदि।

सबसे प्रमुख समस्या है कि जातियों में श्रेष्ठता की भावना कैसे विकसित हो गई? हम उच्च हैं तुम निम्न हो। यह अस्पर्श या अछूत है।

किसी ने स्वच्छता के आधार की बात कही, सही है क्योंकि यह हमारे स्वास्थ्य का आधार है तो जो लोग स्वच्छ तरीके से नहीं रहते है उन्हें तरीका बताया जाये न कि उन्हें अस्पर्श घोषित कर दिया जाये?

प्रत्येक मनुष्य को गरिमामय जीवन जीने का प्राकृतिक, नैतिक और धार्मिक स्तर पर अधिकार है कोई भी मानवीय स्तर पर भेद नहीं कर सकता है।

समय के साथ वर्ण के अंतर्गत विकसित जाति ने एक बृहद आकार ले लिया। समस्या यह थी समाज के मूल स्वरूप बचाने की।

महाभारत और रामायण दोनों में दिखाई पड़ता है कि वर्ण में कोई परिवर्तन न होते हुये आप किसी भी जाति का कार्य कर सकते थे।

महाभारत में द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, अश्वत्थामा आदि ब्राह्मण होकर क्षत्रिय का कार्य करते थे। कर्ण सूत होकर क्षत्रिय कार्य करता था।

भारत के पुराण और इतिहास पर गौर करें तो कई वैश्य व शूद्र भी राजा हुये। व्यवसाय के बदलने से वर्ण परिवर्तन होने लगें तब समाज के नियम कैसे सुरक्षित रहेंगे व्यक्ति रोज पेशा बदलकर जाति बदलने लगेगा। सामाजिक संरचना कैसे सुरक्षित रहेगी क्योंकि समाज नियम से चलता है जिसे ही संविधान कहा जाता है।

हिन्दू धर्म पर विचार करें तो श्रीराम निषादराज गुह को गले लगाते हैं, शबरी के बेर खाते हैं वनवासी सुग्रीव, जामवंत, अंगद आदि की मदद लेते हैं इन्हें अपने राज्यारोहण में भी आमंत्रित कर अपने बगल में स्थान देते हैं।

श्री कृष्ण के समय में महाभारत के युद्ध में सूत कर्ण, बनवासी घटोत्कच, शिखंडी आदि को युद्ध में भाग लेने दिया गया। शम्बूक और एकलव्य की कथा मूल रामायण और महाभारत में नहीं है और न ही मनुस्मृति में है। अतः जाति व्यवस्था का आरोपण निराधार है।

एक फ़्रांसीसी इतिहासकार का कहना है कि विश्व में किसी के इतिहास के साथ सबसे ज्यादा छेड़छाड़ हुई है तो वह है भारत का इतिहास। वैसे भी भारत का इतिहास अंग्रेजों ने लिखा है जिसके धर्मान्ध होने का सबूत है BC (बिफोर क्राइस्ट) और AD का विभाजन। कार्बन डेटिंग तकनीक के विकास के पूर्व ईसाइयों की मान्यता थी ईसामसीह से पूर्व मानवता का विज्ञान का विकास था ही नहीं!!!

भारत में ईसाईयों ने अपने एजेंडे को लागू करने के लिए जातियों को चिन्हित कर उसका राजनीतिक लाभ लेने का दुष्चक्र रचा।

1757 में जब अंग्रेजो ने बंगाल का शासन सम्भाला उस समय भारत दुनिया की GDP में 24 फीसदी योगदान था जो 1800 में 19.6%, 1830 में 17.6%, 1860 में 8.6%, व 1900 में 1.7% रह गया।

आज 2019 में तुलना करें तब भी 1.7% के लगभग ही रहती है क्योंकि लागू तो अंग्रेजी शिक्षा और नीति ही है।

जनसंख्या के अनुपात में यदि अर्थव्यवस्था 17.5% पहुँच जाये तो रोजगार के अनेक अवसर विकसित होंगे। यह दलित, पिछड़ा, अगड़ा, सवर्ण, उच्च, नीच जैसे दायरे में भारतीयों को नहीं भरना पड़ेगा।

भारत के वैभव के स्रोत राजशिल्पी, कृषि, वाणिज्य, शिल्प का विनाश कर “दलित” शब्द गढ़ा गया। ईसाइयों ने पूरा ध्यान भारत के धन और वैभव को लूटने पर दिया था क्योंकि यहाँ के उद्योग और टेक्नोलॉजी को चुरा कर अपने देश में औद्यगिक क्रांति करनी थी। याद रहे भारत की लूट से ब्रिटेन और अमेरिका जिसका 1757 में दुनिया की GDP में मात्र 2% योगदान था उसने भारत का स्थान ग्रहण कर लिया।

ईसाईयों ने भारत को कई स्तर पर तोड़ने की साजिश रची जो प्रमुखतया बौद्धिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और सामाजिक स्तर पर थी।

अंग्रेज जहाँ गये वहाँ के मूल निवासियों का धर्म परिवर्तित कर दिया लेकिन भारत में इन्हें सफलता नहीं मिली। जब भारत में धर्म परिवर्तन होते नहीं दिखा, तो कास्ट सिस्टम के माध्यम से चार हिन्दू वाले समाज को 2000 से अधिक जातियों में चिन्हित कर दिया।

अंग्रेजों की समस्या भारत का आर्थिक प्रकल्प थी जिसका आधार वर्णव्यवस्था थी क्योंकि यही वह स्रोत था जिसने भारत को व्यापार का सिरमौर बनाया था। विश्व भर से सोना चाँदी भारत आकर कैद हो जाता था। इसे ही तोड़ना था।

1901 की जनगणना में मैक्समूलर ने अच्छी साठ- गांठ की थी। 1901 में रिसले ने मैक्समूलर के आर्यन अफवाह से निर्मित तथाकथित सवर्णों को ऊंची जाति घोषित किया और बाकी अन्य समुदायों को नीची जाति का । जातिगत जनगणना ने 2378 जाति बना कर भारत को एक तरह से 2378 टुकड़ों में विभाजित कर दिया गया। दलित शब्द गढ़ दिया गया।

अंग्रेजों ने अपने प्रचारतंत्र में आर्य- अनार्य(दस्यु) आर्य-द्रविड़ के संघर्ष को प्रचारित किया। 1830 के बाद आर्य विदेशी थे का सिद्धांत चलाया गया।

सामन्तवाद, ब्राह्मणवाद, समाजवाद, मार्क्सवाद, व्यक्तिवाद, आधुनिकतावाद सब प्रकार से पूंजीवादी उपनिवेशी व्यवस्था को बचाने का प्रयास किया। मार्क्स स्वयं कहता है कि कुटिल अंग्रेज ने भारत की खड्डी और तकली तोड़ डाली उसे गरीबी के दुष्चक्र में डाल दिया।

भारत के राजशिल्पियों को मजदूर या किसान बनने पर विवश किया गया। 1834 में भारत में गवर्नर जनरल वैटिंग किसानों की लाशों की हड्डियां देख कर कहता है कि उनसे नील इस लिए उगवाई जाती है क्योंकि वह इसे खा नहीं सकता है।

अंग्रेजों ने अपनी नीतियों को सफल करने के लिए भारत में काले अंग्रेज तैयार किये जो मैकाले की स्पष्ट नीति थी। ये काले अंग्रेज नेहरू, अंबेडकर, पेरियार और जिन्ना सरीखे लोग थे। जिन्होंने अंग्रेजो को ईश्वरीय, आधुनिक, वैज्ञानिक, शिक्षक के रूप में प्रस्तुत किया शोषणकारी के रूप में नहीं। इन्होंने सनातनी व्यवस्था को दोषी ठहराया। सवर्ण अवर्ण ऊँच, नीच और जातियों को ही सच्चाई मान लिया।

आरक्षण का मुख्य उद्देश्य है व्यक्ति को सुदृढ करना सरकारी नौकरी देना और असमानता को समाप्त करना। आरक्षण की वास्तविक स्थिति को देखें तो कुछ लोग जरूर बढ़े है लेकिन असमानता की खाई और चौड़ी होने के साथ वैमनस्यता बलवान हो गई। इस सब के बीच अंग्रेज पाक साफ बना रहा कारण भारत के वह नेता थे जो नया वर्ग काले अंग्रेज में गर्व कर रहा था।

दिल्ली में पिछले दिनों रविदास मंदिर के आंदोलन में देखा गया कि कितनी ज्यादा वैमनस्यता लोगों में एक दूसरे के प्रति बढ़ गयी है। केरल में दलित को थेवर (OBC) जाति ने लाश जाने नहीं दिया इसको मीडिया में सवर्ण के द्वारा किया गया कारनामा कहा गया। ऐसी ही कई घटनाओं में फेक न्यूज का सहारा लेकर समाज को तोड़ने का राजनीतिक कुचक्र किया जा रहा है। तुम मेरी मूर्ति तोड़ोगे मैं तुम्हारी मूर्ति तोडूंगा, तुम मुझे गाली दोगों मैं तुम्हें और जोर से गाली दूंगा।

जब भारत में जातियों की स्थिति का आंकलन करते हैं तब मुस्लिम और ईसाइयों में भी कई जातियों का प्रचलन है। केरल में नीची जाति के ईसाईयों के अलग गिरिजाघर हैं। पिछले दिनों एक दलित लड़के को इसलिए मार दिया गया कि वह ईसाई लड़की से प्रेम करता था।

मुसलमानों की बात करें तो उनमें भी कई उच्च जातियां खान, पठान, अंसारी, मुगल हैं। बिहार सरकार ने पिछले दिनों 27 मुस्लिम जातियों को पिछड़े वर्ग में आरक्षण देने के लिए शामिल किया था। छुआछूत को भारत में मुस्लिम शासकों द्वारा ही बढ़ावा दिया गया था धर्मांतरण को बढ़ावा देने के लिए। क्योंकि सबसे बड़ी समस्या गरीबी है और गरीब यदि सामाजिक सम्मान से वंचित है तो उसे भड़काकर धर्मांतरित आसानी से किया जा सकता है।

पाकिस्तान और बांग्लादेश में आज भी शूद्र हिन्दू उनके मुसलमानों के कुएं, बावड़ी, नल से पानी नहीं भर सकता है। यह मुस्लिम छुआछूत को क्यों बनाये है जिससे यह विवश होकर मुस्लिम बन जायें। ईसाई और मुस्लिम दोनों एक ही अब्राहमिंक परिवार के है दोनों दूसरे का धर्म परिवर्तन कराने में विश्वास करते है।

आरक्षण का मकसद समानता लाना, समाज में पीछे छूटे लोगों को लाभ पहुँचाना था आर्टिकल 15(4) और 16(4) के माध्यम से। 72 साल बाद भी किसी जाति का प्रतिनिधित्व पूर्ण नहीं हो पाया। आरक्षण जिसे मिला है उसने इसे अपना अधिकार मान लिया है जिसे नही मिला है वह पिछड़ा, दलित बनने के लिए संघर्ष कर रहा है। डॉ अंबेडकर ने कहा भी था किसी हाल में 10 वर्ष से अधिक आरक्षण का प्रावधान न हो नहीं तो राजनीतिक रोटियां सेकी जायेंगी। जो आज सत्य साबित हुआ है नेता को समस्या खत्म होने का एक मात्र विकल्प आरक्षण दिखता है जबकि रोजगार वृद्धि का कोई प्रयास नहीं है।

साभार – धनंजय गांगेय

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