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7 नवम्बर 1966: कांग्रेस द्वारा किया गया 2200 गौरक्षक साधु-संतों का नरसंहार

भाजपा द्वारा साध्वी प्रज्ञा ठाकुर को भोपाल से दिग्विजय सिंह के विरुद्ध टिकट देने की घोषणा के बाद से कांग्रेसी व् क्रिस्लामो-कॉमि हिन्दू विरोधी मानसिकता के कारण उद्वेलित व् आक्रोशित हैं। सम्भवतः यही कारण था कि कांग्रेसवाले केरल में हिंदुओं की आस्था को आघात पहुंचाने हेतु बीच सड़क पर गाय काटकर उसे पकाकर खा रहे थे।

कांग्रेस की इसी हिन्दू विरोधी मानसिकता को उजागर करने हेतु आज मैं आपका परिचय उस घटना से करवाने जा रहा हूँ जिसका आंखों देखा वर्णन पत्रकार मनमोहन शर्मा ने अपने लेख में शब्दों के माध्यम से किया था।

यह लेख पंजाब केसरी में प्रकाशित भी हुआ था, किंतु कांग्रेस का यह कुकर्म इतना वीभत्स था कि पूरे कांग्रेसी इकोसिस्टम ने ये सुनिश्चित किया कि देश की जनता 1966 के उस वीभत्स सन्त नरसंहार से अनभिज्ञ रहे।

1966 के संत नरसंहार की पृष्ठभूमि यह थी कि प्रधानमंत्री पद के लिए चुनाव लड़ने से पूर्व इंदिरा गांधी साधु संतों के पास आशीर्वाद लेने गई,जिनमें करपात्री महाराज भी सम्मिलित थे।

करपात्री महाराज ज्योतिरमठ के शंकराचार्य ब्रह्मानंद सरस्वती के शिष्य थे, वाराणसी स्थित धर्म संघ के संस्थापक थे और सनातन दर्शनशास्त्र संस्थान अद्वैता वेदांत में शिक्षक भी थे, 1948 में उन्होंने “संमार्ग” नामक समाचार पत्र आरंभ किया था, तथा 1948 में ही उन्होंने एक पारंपरिक हिंदू राजनीतिक पार्टी “ राम राज्य परिषद” का गठन किया था, हिंदू कोड बिल के भेदभाव पूर्ण नियमों के विरुद्ध उन्होंने एक बहुत बड़ा जनआंदोलन भी किया और गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने हेतु भी कार्य करते थे।

इंदिरा गांधी द्वारा समर्थन मांगने पर करपात्री महाराज ने इंदिरा को सशर्त समर्थन दिया और शर्त यह थी कि प्रधानमंत्री बनने के बाद इंदिरा पूरे भारतवर्ष में गौ हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगवाएँगी।

किंतु नेहरू गांधी परिवार की परंपरा अनुरूप इंदिरा ने करपात्री महाराज संग छल किया व् प्रधानमंत्री बनने के बाद करपात्री महाराज द्वारा कई बार याद दिलाने पर भी गोहत्या प्रतिबंध पर कोई कदम नहीं उठाए।
करपात्री महाराज समय-समय पर इंदिरा गांधी से मिलने उन्हें उनका वचन याद दिलाने दिल्ली आते रहे, किंतु इंदिरा गांधी उन्हें टालती रही, अंत में जब इंदिरा गांधी ने करपात्री महाराज के आगमन पर उनसे मिलना भी बंद कर दिया तब करपात्री महाराज ने आंदोलन का मार्ग चुना।

करपात्री महाराज के नेतृत्व में गौरक्षा अभियान समिति का गठन हुआ, संगठन से लाखो की संख्या में लोग जुड़े और आंदोलन आरंभ होने के बाद 44,000 से अधिक गौरक्षकों ने गिरफ्तारीयां दीं, परंतु इंदिरा, गौरक्षा अभियान समिति और करपात्री महाराज की मांगों को इसके बाद भी स्वीकार नहीं कर रही थी, अतः अंतिम विकल्प के रूप में करपात्री महाराज ने संसद भवन के बाहर अपने शिष्यों व समर्थकों संग धरना देने का निश्चय किया, किंतु उसकी परिणिति क्या होने वाली थी इसकी करपात्री महाराज ने स्वप्न में भी कल्पना नहीं की थी।

उन दिनों प्रदर्शनकारियों को संसद भवन परिसर के गेट तक आने की अनुमति थी, 5 नवंबर से ही देश के कोने-कोने से गौ भक्तों के जत्थे प्रदर्शन में भाग लेने पहुंचने शुरू हो गए, 7 नवंबर 1966 को संसद के सामने बहुत बड़ा मंच बनाया गया, सुबह 8:00 बजे से नगर के विभिन्न भागों से गौभक्तों के समूह प्रदर्शन में भाग लेने संसद पहुंचने शुरू हो गए।

मंच पर दो-ढाई सौ नेता विराजमान थे इनमें चारों शंकराचार्य, हिंदू ह्रदय सम्राट स्वामी करपात्री जी महाराज, रामचंद्र वीर जी के साथ आर्य-समाज, गौ सेवा अभियान, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, नामधारी समाज तथा दर्जनों संगठनों के नेता सम्मिलित थे और भाषणों का दौर शांतिपूर्ण ढंग से चल रहा था।

पत्रकार मनमोहन शर्मा बताते हैं कि वह वक्ताओं के भाषण को रिपोर्ट करने हेतु संसद भवन के प्रेस रूम में बैठे हुए थे कि अचानक लोकसभा सुरक्षा दल के एक प्रमुख अधिकारी घबराए हुए प्रेस रूम में पहुंचे और उन्होंने यह सूचना दी कि गौभक्तों व् साधु संतों पर पुलिस गोलियां चल रही है।
मनमोहन शर्मा को लगा कि पुलिस आंसू गैस चला रही होगी जिसे इस अधिकारी ने गोलियां समझ लिया है, किंतु उसके बाद कई लोग अंदर आये और उन्होंने इस बात की पुष्टि कर दी, मनमोहन शर्मा दौड़ते हुए संसद परिसर के मुख्य गेट की तरफ गए और देखा कि पुलिस वास्तव में गौभक्तों की भीड़ पर अंधाधुंद गोलियां चला रही थी।
चारों ओर गोलियोँ की आवाज गूंज रही थी, आंसू गैस के धुंए के कारण आंखों में जलन वह सांस लेने में तकलीफ हो रही थी, मनमोहन शर्मा ने रुमाल पानी से भिगोकर आँखों व् नाक पर बांधा और संसद भवन परिसर की ओर निकल गए, वहां उन्होंने पाया कि जहां तक उनकी दृष्टि जा रही थी वहां चारों तरफ केवल लाशें ही लाशें बिखरी हुई थी, चारों और खून बह रहा था जिससे सड़क लाल हो गई थी, सड़क पर भारी संख्या में लोगों के जूते चप्पल बिखरे हुए थे, संसद भवन से लेकर पटेल चौक तक शव बिखरे हुए थे, घायल जहाँ तहाँ जमीन पर पड़े कराह रहे थे और पानी मांग रहे थे, परिवहन विभाग भवन, आकाशवाणी भवन, एवं योजना भवन के बाहर कुछ वाहन जल रहे थे, फिर उन्हें पता चला कि पुलिस अशोक रोड स्थित कामराज नगर और गोल डाकखाना के पास भी प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चला रही है, इसके तुरंत बाद रीगल और विंडसर प्लेस पर भी गोलियां चलाए जाने का समाचार प्राप्त होना शुरू हुआ, और मनमोहन शर्मा ये समाचार देने पुनः संसद भवन की और भागे, जहाँ उन्हें तत्कालीन गृहमंत्री गुलज़ारी लाल नन्दा खड़े दिखे, उनकी आँखों में आंसू थे, निर्दोष साधु संतों के रक्त रंजित शवों को देखकर पत्रकार मनमोहन शर्मा अपना आपा को बैठे और गृहमंत्री गुलज़ारी लाल नंदा पर बरस पड़े, और चिल्लाते हुए बोले
“तुम्हे शर्म नहीं आती, एक ओर गौभक्त बनते हो, और दूसरी और निर्दोष गौभक्तों पर गोलियां चलवा रहे हो ?”
मनमोहन शर्मा आवेश में बोलते जा रहे थे, और गुलज़ारी लाल नन्दा अश्रुपूरित आँखों से सब सुने जा रहे थे।
मनमोहन शर्मा के चुप होने के बाद उन्होंने रोते हुए उत्तर दिया की “भाई मैंने कोई गोली चलाने का निर्देश नहीं दिया, मैं खुद हैरान हूं कि गोलियां क्यों और किसके आदेश पर चलायीं जा रही हैं”

मनमोहन शर्मा लिखते हैं कि प्रेस रूम में गोली चलाये जाने का समाचार अपने दफ्तर को देने के बाद वे पुनः रिपोर्टिंग हेतु बाहर निकल पड़े, संसद भवन से लेकर पटेल चौक तथा कृषि भवन विंडसर प्लेस और गोल डाकखाना तक साधु-संतों, पुरुषों, औरतों और बच्चों के बेशुमार शव बिखरे हुए थे और सड़कों पर हर जगह खून पड़ा था, इतने में पुलिस ने रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकार मनमोहन शर्मा को वहाँ से हटा दिया और उन्हें पुनः सन्सद भवन को वापस लौटना पड़ा, रास्ते में उन्होंने देखा कि सैनिकों की टुकड़ियां अपने ट्रकों और बख्तरबंद वाहनों में सवार सन्सद की ओर पहुंचना शुरू हो गए थे, सेना ने चारों तरफ मोर्चा संभाल लिया था और किसी को बाहर निकलने की अनुमति नही थी।

दिल्ली पुलिस के गुप्तचर विभाग के एक अधिकारी से मनमोहन शर्मा को जानकारी प्राप्त हुई कि शवों को दिल्ली के चार अस्पतालों में पहुँचाया जा रहा है, जब मनमोहन शर्मा वेलिंग्टन अस्पताल पहुंचे तो वहाँ कड़ी सुरक्षा थी और किसी को अंदर जाने कि अनुमति नही थी, किसी परिचित पुलिस अधिकारी के सहयोग से अंदर घुसे तो पाया कि वहां शवों के अम्बार लगे हुए थे, और गिनने पर पाया कि शवों की संख्या 374 थी, जिनमे सौ से अधिक महिलाओं व् बच्चों के शव भी सम्मिलित थे, इसके बाद सैनिकों ने मनमोहन शर्मा को शाम तक अस्पताल से निकलने की अनुमति ही नहीं दी, जिसके बाद उन्होंने अपने दफ्तर फोन कर अन्य तीन अस्पताल जहाँ शव रखे जा रहे थे वहाँ पर संवाददाता भेजने को कहा, किन्तु कड़ी होती जा रही सुरक्षा बलों की टीमों ने किसी को भी अंदर नहीं घुसने दिया।

ढलती शाम के साथ अपने दफ्तर पहुंचकर मनमोहन शर्मा अपने साथियों संग यह खबर लिखने की तैय्यारी कर रहे थे कि गृह मंत्रालय से निर्देश प्राप्त हुआ कि इस नरसंहार पर पूरे देश में केवल सरकार द्वारा जारी प्रेसनोट ही प्रकाशित व् प्रसारित करें, कोई भी समाचार पत्र या संवाद समिति अपने संवाददाता द्वारा तैयार की गयी किसी भी खबर को प्रकाशित व् प्रसारित नहीं करेगी।

इस तरह से इंदिरा गांधी की सरकार ने मीडिया पर इस नरसंहार की खबर प्रकाशित करने से रोक लगा दी, सरकारी प्रेस नोट में दावा किया गया था कि प्रदर्शनकारियों पर हुई पुलिस फायरिंग में केवल 16 व्यक्ति मरे हैं, प्रेस नोट में लिखा गया था कि दिल्ली में अनिश्चितकालीन कर्फ्यू लगाया जा रहा है और प्रशासन सेना के हवाले किया जा रहा है।

मनमोहन शर्मा लिखते हैं कि बाद में उन्हें जानकारी हुई की गौरक्षकों पर गोलियां चलवाना एक सुनियोजित षड्यंत्र था जिसमें एक कुख्यात कांग्रेसी सांसद और ग्रहमंत्रालय का एक राज्यमंत्री सम्मिलित था, षड्यंत्र का उद्देश्य गौरक्षा अभियान को बदनाम करना और गुलजारी लाल नंदा को गृहमंत्री पद से हटवाना था।

वाहनों में आग लगाने एवं विभिन्न सरकारी भवनों पर हमला करने के हेतु कांग्रेस कार्यकर्ताओं और गुंडों को विशेष रूप से हरयाणा, पश्चिमी यूपी, राजस्थान से बुलाया गया था, इसके अलावा मनमोहन शर्मा लिखते है कि उन्हें जानकारी प्राप्त हुई की गुप्तचर विभाग ने ग्रहमंत्रालय को यह सुचना पहले ही दी थी की दिल्ली पुलिस साधु-संतों, पुरुषों, महिलाओं, बच्चों और बूढ़ों पर गोली चलाने से इंकार कर सकती है, इसीलिये कश्मीर मिलिशिया को विशेष रूप से बुलाया गया था, और निर्देशित किया गया था कि गोली घायल करने हेतु पैरों पर नहीं अपितु वध करने हेतु सीने व् सर में मारनी है, मिलिशिया ने 11 हजार राउंड फायर किए थे, मरने वालों की संख्या 2000 से 2200 के बीच आंकी गयी थी, बाद में ये सारे रिकॉर्ड प्रधानमंत्री कार्यालय के निर्देश पर नष्ट कर दिए गए।

पूरा षड्यंत्र शत प्रतिशत सफल रहा, हताशा ग्रस्त होकर गुलज़ारीलाल नन्दा ने त्यागपत्र दे दिया और गौरक्षा आंदोलन भी समाप्त हो गया, आजतक इस नरसंहार की कभी कोई जांच नहीं हुई, किसी दोषी को कोई दंड नहीं मिला, स्थिति यह है कि इस घटना को स्वतंत्र भारत के इतिहास से ही मिटा दिया गया और अधिकांश भारतीयों को पता ही नहीं की ऐसा भी कुछ इस देश की राजधानी में घटित हुआ था, जिसमे निर्दोष निहत्थे साधु-संतों, पुरुषों, महिलाओं और बच्चों का बर्बरतापूर्वक कांग्रेसियों ने नरसंहार करवाया था।

(लेख के तथ्य राष्ट्रीय संवाद समिति हिंदुस्तान समाचार के पत्रकार के रूप में उस प्रदर्शन को कवर कर रहे मनमोहन शर्मा द्वारा अपने लेख “जब दिल्ली में गौभक्तों के खून की होली खेली गई” (पंजाब केसरी 07-11-2016, पृष्ठ11) में वर्णित उस दिन की घटनाओं पर आधारित है)।

–रोहन शर्मा

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