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क्या भारत में तारा जैसी क्षत्राणियों का पुनः प्रादुर्भाव होगा?

राजस्थान के कई रियासतों को जीतने के बाद अलाउदीन खिलजी की सेना “बिदनौर” नाम की एक छोटी सी रियासत को जीतने के लिये संघर्षशील थी क्योंकि वहाँ के राजा सूरसेन अपनी राष्ट्र-भक्त प्रजा के साथ आसानी से पराजित होने को तैयार नहीं थे।

पर कहाँ सूरसेन की छोटी सी राजपूत सेना और कहाँ निरंतर विस्तृत होती अलाउद्दीन खिलजी की विशाल सेना। सूरसेन पराजित हुये, उनके पूरे परिवार को मार दिया गया और बिदनौर के किले पर लगे भगवा ध्वज को उखाड़ कर खिलजी के सब्ज़ झंडे को लगा दिया गया।

पराजित और अपमानित सूरसेन अपनी एक जीवित बची बेटी को किसी तरह बचाते हुए वहाँ से निकल गये।

किसी जंगल में निर्वासित जीवन जीते हुए सूरसेन ने संकल्प लिया कि अपनी बिटिया को वो ऐसी शिक्षा और ऐसे संस्कार देंगे कि वो एक पुत्र की तरह उनके पराधीन राज्य को मुक्त करायेगी और इसी तरह उन्होंने अपनी पुत्री की परवरिश की।

बिटिया को हमेशा याद दिलाया कि तुम्हारा ध्येय क्या है और उससे यही कहा कि तुम्हारी शादी भी उसी से होगी जो तुम्हारे साथ बिदनौर मुक्ति यज्ञ का वाहक बनेगा।

बड़ी हुई तो उस अपूर्व सुंदरी तारा के साथ विवाह के लिये अनेक राजकुमारों का प्रस्ताव आया पर तारा ने स्पष्ट कह दिया कि विवाह तो उसी से करुंगी जो पुनः मेरे बिदनौर किले पर भगवा फहराएगा।

तारा के इस प्रण की सूचना चित्तौड़ के निर्वासित राजकुमार पृथ्वीराज के पास भी पहुँची जो स्वयं अलाउद्दीन से बदला लेने को लालायित थे। वो उधर राजपूत योद्धाओं को प्रशिक्षण भी दे रहे थे। एक दिन वो महाराज सूरसेन के पास पहुँच गये और उनसे कहा कि मुझे आपके संकल्प के बारे में पता है इसलिये मैं आपसे बिदनौर मुक्ति के लिये आशीर्वाद लेने आया हूँ।

तारा ने जब ये सुना तो वो भी पृथ्वीराज के साथ जाने को तैयार हो गई और दोनों ने केवल 500 राजपूत युवकों के साथ बिदनौर के किले पर हमला बोल दिया। पृथ्वीराज की तलवार काल बनकर बरसी और उसने अलाउद्दीन के अफगान सरदार की गर्दन उतार दी और अलाउद्दीन की सेना में आतंक मचा दिया।

पुरुष भेष में छिपी तारा ने अपने हाथों से अलाउद्दीन के झंडे को नोंचकर फेंक दिया और वहाँ भगवा फहरा दिया।

बिदनौर मुक्त हुआ, सूरसेन भाव-विह्वल हो गये और पूर्ण वैदिक रीति से अपनी बिटिया तारा का हाथ हिन्दू वीर पृथ्वीराज को दे दिया।

ये था “हिन्दू संस्कार” जो सूरसेन ने अपनी बेटी को दिया था।

आज जब वो लोग जिन्हें “प्रकाश स्तम्भ” बनना था वही “अंधकार के किलविष” बनकर अपनी पुत्रियों को संस्कारित करना तो दूर उल्टा उसके पथभ्रष्ट होने के भूमिकाकार बनकर गौरवान्वित हो रहे हैं तो ऐसे में सूरसेन का आदर्श चरित हर बाप-दादा और चाचा के लिए पाथेय है।

Abhijeet Singh

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