FEATURED

केवल अंग्रेजी ही नहीं, उर्दू भी गुलामी का प्रतीक है

उर्दू केवल एक देश की राष्ट्रभाषा है जहाँ किसी की वह मातृभाषा नहीं है — पाकिस्तान — ऐसा अजूबा दुनिया में और कहीं नहीं मिलेगा | भारत में मुसलमान बादशाहों की फौजी छावनी के भारतीय लोगों की भाषा (अमीर खुसरो के शब्द में “हिन्दवी”, जिसे बाद में हिन्दी कहा गया) को बाद में उर्दू कहा गया, उर्दू का अर्थ फारसी में था “फौजी छावनी”| अर्थात जो धर्म परिवर्तन करने वाले हिन्दुस्तानी लोग तुर्क-पठानों के भाड़े के लठैत थे उनकी भाषा विदेशियों द्वारा उर्दू कहलाती थी | इसे बाजाप्ता “उर्दू” नाम देकर पृथक भाषा बनाने का षड्यन्त्र 18 वीं शती में हैदराबाद के निजाम ने आरम्भ किया | पहले यह हिन्दी कहलाती थी |

केवल लिपि बदलने (हिन्दी में देवनागरी के स्थान पर उर्दू में विदेशी फारसी लिपि) और कुछ फारसी शब्द उधार लेने से भाषा नहीं बदलती | उर्दू उन मूर्खों की भाषा है जो है तो हिन्दुस्तानी लेकिन शासक वर्ग की भाषा फारसी नहीं सीख सके तो हिन्दी को ही लिपि बदलकर लिखने लगे | हिन्दी का एक वाक्य लें — “राम आम खाता है” — इसे उर्दू में क्या बोलेंगे ? राम को रहमान और आम को खजूर नहीं बोलेंगे न?
एक भी भाषा के दो टुकड़े कर दिए, बाद में देश भी बाँट लिया ! कश्मीरी भाषा का भी यही हाल किया | पूर्वी बंगाल में बांग्ला का भी यही हाल हुआ | पंजाबी के साथ भी पाकिस्तान में पहले ऐसा ही किया, बाद में उर्दू बोलने लगे | पाकिस्तानी पंजाब में घर की भाषा पंजाबी है और बाहर की उर्दू , हालांकि उर्दू या हिन्दी वहाँ की लोकभाषा कभी नहीं थी |

व्याकरण और भाषाविज्ञान के किसी भी सिद्धान्त के आधार पर उर्दू को स्वतन्त्र भाषा सिद्ध करना असम्भव है | सम्प्रदायवाद के आधार पर भाषा को बाँटने वाली अवैज्ञानिक गुण्डागर्दी का यह ज्वलन्त उदाहरण है जिसे तुष्टिकरण करने वालों ने संवैधानिक मान्यता भी दे दी ! उर्दू को संविधान की अष्टम अनुसूची से हटाया जाना चाहिए |

मैं तो पूरी अष्टम अनुसूची को ही हटाने का पक्षधर हूँ — यह सरासर अन्याय है कि आप केवल अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषाओं को मान्यता दें और छोटी संख्या वाली भाषाओं को विकास नहीं करने दें — क्या वे गुलामों या दूसरे दर्जे के नागरिकों की भाषाएँ है ? अष्टम अनुसूची भारतीय संविधान की मौलिक भावनाओं का घोर अपमान है |

“उर्दू” शब्द मूलतः संस्कृत के “घोटक:” से बना जिससे हिन्दी का “घोड़ा” बना | भारत से बाहर “घ” का “ह” होने से अंग्रेजी में “हॉर्स” (घोड़स्” से, विसर्ग को संस्कृत में हलन्त ‘स’ भी लिखते हैं ; उससे “horde” शब्द बना जिसे तुर्क में ओरडू कहते थे) बना और तुर्क भाषा में “ओर्दू” (“घोरदू” से) जिससे बाद में फारसी में “उर्दू” बना | घुड़सवार सैनिकों की छावनी के लिए इसका प्रयोग होता था | पश्चिम के भाषाविदों को संस्कृत से तुर्क का सम्बन्ध जानने में रूचि ही नहीं है |

संसार के सारे विकसित और शक्तिशाली देश अपनी भाषा का सम्मान करने के कारण ही प्रगति कर पाए हैं | भारत और पाकिस्तान में केवल अंग्रेजी ही नहीं, उर्दू भी गुलामी का प्रतीक है |

विनय झा
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Most Popular

राष्ट्र को जुड़ना ही होगा, राष्ट्र को उठना ही होगा। उतिष्ठ भारत।

Copyright © Rashtradhara.in

To Top