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यूँ तो भगवान श्रीकॄष्णचन्द्र
जिस चित्र का वर्णन कर रहा हूँ, वो चित्र है; जिसमे भगवान् श्रीकृष्ण दुरात्मा राजा कंस की छाती पर चढ़ कर मुक्का मार रहे है| बचपन से ही इसका मन पर बहुत अच्छा प्रभाव पड़ता था तब सोचता था कि भगवान श्रीकृष्ण अच्छे है, कंस बुरा है, इसलिए इस दुष्ट राजा को मार रहे है| थोडा बड़े होने पर समझ आया की इस चित्र का अर्थ ये भी हो सकता है, कि श्रीकृष्णचन्द्र
कुछ और बड़े हुए, तो ये समझ में आया कि अपने साथ हुए धर्म-विरुद्ध अन्याय का प्रतिकार अवश्य ही लेना चाहिए, चाहे ऐसा करने वाले सगे सम्बन्धी ही क्यों न हो | मथुरा का दुष्ट राजा कंस श्रीकृष्ण भगवान् का मामा था, परन्तु भगवान् श्रीकृष्ण ने अन्यायी के प्रति किसी भी तरह का दया भाव नहीं दिखाया| यही सन्देश उन्होंने अर्जुन को भी महाभारत के युद्ध में भी दिया कि धर्म की स्थापना में सगे-सम्बन्धी मित्रो आदि के मोह में नहीं पढना चाहिए, जो भी अधर्मी है, धर्मद्रोही है, उसका पूर्ण नाश करना अत्यंत आवश्यक है, अन्यथा ये धर्मद्रोही धर्म की हानि ही करेंगे.
कुछ और बड़े हुए तो समझ में आया कि भगवान् श्री कृष्ण तो अवतार है, बुराई को समाप्त करने के लिए ही आते है, यदा यदा ही धर्मस्य भी पढ़ किया था तब तक, और यह आस्थाा निश्चित हो गयी थी कि धर्म स्थापना के लिए ही भगवान् श्रीकृष्ण आये और अत्याचारी राजा कंस को समाप्त किया, जिसका कोई विकल्प किसी को भी दिखाई नहीं देता था.
अब लगता है की इस चित्र के और भी अर्थ है| श्रीकृष्ण अद्भुत है, अनुपम है, अद्वितीय है, वो सामान्य जन के साथ रहते है, सामान्य जन जैसे ही रहते है, ग्वाल बाल के संग खेलना कूदना, गैया चराना, लोक के रंग में रचे बसे, सब को अपने रंग में रच बसा लेने की दिव्य क्षमता के साथ|
श्रीकृष्ण लोक सत्ता के प्रतीक है, वो धर्म है दूसरी और कंस है निर्दयी, निरंकुश, बर्बर अत्याचारी राजसत्ता का प्रतीक, जो अपनी प्रजा के निरीह अबोध शिशुओ को भी अपने राजसत्ता के लिए संकट मानता है और उनका निर्दयता से वध करने का निरंतर प्रयास करता रहता है|
अपनी प्रजारक्षण के बजाय उसपर अत्याचार करने का हर संभव उपाय करता रहता है और इसके लिए आसुरी शक्तियों, पैशाचिक शक्तियों, दैत्यों का भी प्रयोग करने में नहीं संकोच करता है| परन्तु समाज-सत्ता, धर्म-सत्ता, लोक-सत्ता के प्रतीक भगवान् श्रीकृष्ण का बाल्यावस्था में भी कुछ बिगाड़ नहीं पाता है| राजा कंस की आसुरी राजसत्ता भगवान् श्रीकृष्ण की समाज सत्ता के समक्ष प्रत्येक अवसर पर पराजित होती है|
अंततः वह दिन भी आता है जब श्रीकृष्ण भगवान् दुष्ट राजा कंस की आसुरी राजसत्ता का समूल नाश करने के लिए मथुरा आते है, एक मात्र अपने अग्रज दाऊ बलराम के साथ, कोई सेना नहीं | परन्तु मथुरा की प्रत्येक गली घर का सामान्य जन उनके साथ हो लेता है और भगवान् उस सर्वशक्तिशाली समाज के प्रतिनिधि के नाते कंस की राजसत्ता को उसके ही गढ़ मथुरा में चुनोती देते है और उसका समूल ध्वंस करके समाजसत्ता की धर्म-सम्मत श्रेष्ठता स्थापित करते है | कंस का धर्मसम्मत वध निरंकुश राजसत्ता के प्रति जनविद्रोह के सहज विद्रोह की सफलता का प्रतीक है और भगवान् श्रीकृष्ण है उस जनविद्रोह के महानायक, समाज सत्ता की राजसत्ता पर श्रेष्ठता की पुनः स्थापना के यज्ञ के पुरोहित|
हमारे कान्हा का सम्पूर्ण जीवन धर्म स्थापना का संघर्ष है, जन्म से लीला संवरण पर्यंत, एक ध्येय और वो है धर्म स्थापना, फिर उसके लिए चाहे, पूतना राक्षशी का स्तनपान करते हुए प्राण हरना हो या फिर महाभारत युद्ध में रथ का चक्र उठा कर स्वयं की शस्त्र न उठाने की प्रतिज्ञा तोडना हो, जीवन का प्रत्येक क्षण धर्म स्थापना के लिए|
आज भी हमारे राष्ट्रीय जीवन में बर्बर, असंवेदनहीन, आततायी, समाज-विरोधी, शास्त्र-विरोधी,
वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था भय, भूख और भ्रष्टाचार से मुक्ति देना तो दूर समाज को अपनी पाशविक जकड से अकाल मृत्यु की तरफ धकेल रही है| जिस पुण्यभूमि में शिक्षा, न्याय, स्वास्थ्य पर सबका सहज अधिकार था, आज उसी पुण्य भूमि में, माँ भारती की संतानों के पास न शिक्षा है, ना भोजन, ना अवसर की उपलब्धता है, ना न्याय की सुलभता है|
राष्ट्र के सनातन धार्मिक, सांस्कृतिक मूल्यों को आसुरी राज्य व्यवस्था समाप्त करने पर तुली हुई है| भारत भूमि के श्रद्धा केन्द्रों को सत्ता नष्ट करने में लगी हुई है| हमारी सनातन परंपरा की पहचान के प्रतीक भगवा को राजसत्ता से अपमानित करवाया जा रहा है| श्रद्धा केन्द्रों, मंदिरों, मठो, आश्रमों को तिरस्कार कर नष्ट किया जा रहा है और ऐसे में समाज सत्ता मौन है, जिस समाज में साक्षात् धर्म विराजमान है, वो समाज मौन है, जिस समाज ने बड़े से बड़े आततायी को धुल चटाई, वो आज मौन है| आज उसका मौन उसकी असहायता को स्पष्ट रूप से दिखा रहा है, ये मौन आत्मघाती है, दुर्भाग्यपूर्ण है, अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है|
क्यों स्वीकार किया है हमने इस नपुंसकता को?
इस ओढ़ी हुई असहायता का उत्तरदायित्व हम पर ही है न!!
हम ना भूले कि हमारी आने वाली पीढियां हमसे ये उत्तर मांगेंगी कि हमने प्रतिरोध क्यों नहीं किया?
हमारे पुरखे हमसे उत्तर मांगेंगे कि हमने प्रतिरोध क्यों नहीं किया?
क्या उत्तर होगा हमारे पास?
श्रीकृष्ण भगवान् की दो माताए थी, एक माँ देवकी और एक माँ यशोदा, एक जन्म देने वाली, एक पालने वाली |
हम सभी की भी दो माताए है, एक जन्म देनेवाली और एक हमारी भारत माता, हम ना भूले कि माँ भारती की संतान का दायित्व हमें पूरा करना है, हमारी मातृभूमि पर हो रहे आसुरी पैशाचिक राजसत्ता के विरुद्ध हम अपने भीतर सोये हुए श्रीकृष्ण को जगाये, हमारे भीतर का कृष्ण जागेगा तो समाज सत्ता आसुरी राज-व्यवस्था को उखाड़ फेंकेगी, धर्म की पुनर्स्थापना होगी !! सनातन परंपरा के अनुरूप राज-व्यवस्था के अंतर्गत ही माँ भारती के गौरव की पुनर्स्थापना हो पाएगी !!
श्रीकृष्णजन्मोत
साभार देवेंद्र शर्मा